क्यों वर्जित हैं तुलसी, भगवान गणेश की पूजन में?

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भगवान गणपति के प्राकट्य उनकी लीलाओं तथा उनके मनोरम विग्रह के विभिन्न रूपों का वर्णन पुराणों और शास्त्रों में प्राप्त होता है। हाथी जैसा सिर और बड़ा-सा पेट गणेश जी की पहचान है। गणेशजी का नाम हिन्दू शास्त्रो के अनुसार किसी भी कार्य के लिए पहले पूज्य है।

इन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है जो आने वाले सभी कठिनाइयों को हटा कर सफलतापूर्वक कार्य सम्पन्न करते है। गणेश जी को मोदक, गेंदे का फूल, दूर्वा घास, शंख और केला बहुत प्रिय है, लेकिन गणेश जी को तुलसी प्रिय नहीं हैं।
गणेश जी के पूजन में तुलसी वर्जित है। जबकि हमारे सनातन धर्म में तुलसी माता घर-घर पूजी जाती हैं। जगन्नाथ भगवान श्री कृष्ण को तुलसी के बिना भोग ही नहीं लगता।

हिंदू धर्म में तुलसी को सर्वाधिक पवित्र तथा माता स्वरुप माना जाता है।आयुर्वेद की दृष्टि से भी तुलसी को औषधीय गुणों वाला पौधा माना जाता है तथा इसे संजीवनी की संज्ञा तक दी गई है। शास्त्रों में तुलसी को मां लक्ष्मी कहकर पुकारा गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी तुलसी के पत्तों का सेवन अनेक रोगों के उपचार में काम आता है…

अनेक ग्रंथो में भी तुलसी की महिमा का बखान हुआ है।परंतु क्या आप जानते हैं की विष्णु प्रियातुलसी को भगवान गणेश की पूजा में निषेध क्यों माना गया है। पौराणिक काल में गणेश जी गंगा तट पर तपस्या में लीन थे। इसी कालावधि में धर्मात्मज की नवयौवना कन्या तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया…

देवी तुलसी सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए गंगा के तट पर जा पंहुची। गंगा तट पर देवीतुलसी ने युवा तरुण गणेश जी को देखा जो तपस्या में लीन थे। शास्त्रों में ऐसा माना जाता है, तपस्या में लीनगणेश जी रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान थे।

उनके समस्त अंगों पर चंदन लगा हुआ था। उनके गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण-मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। उनकी कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटाहुआ था। गणेश जी को देखकर देवी तुलसी का मन उन पर मोहित हो गया। तब देवी तुलसी ने गणेश जी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने हेतु उपहास किया…

इस कृत्य से गणेश जी का ध्यान भंग हो गया। गणेश जी ने तुलसी से उनका परिचय मांगा तथा उनके यहां आने का कारण भी पूछा। तब तुलसी ने अपने विवाह के लिए कर रही तीर्थ यात्रा का वर्णन किया।इस पर गणेश जी ने देवी तुलसी से कहा कि, तपस्या में लीन किसी ब्रह्म योगी का ध्यान भंग करना अशुभ होता है तथा तुलसी द्वारा किए गए इस कृत्य को अमंगलकारी बताया।

जब गणेश जी को ये पता चला कि, तुलसी के मन में उनसे विवाह करने की मंशा है तो ये जानकर गणेश जी ने स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर देवी तुलसी के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया।गणेश जी द्वारा विवाह आवेदन ठुकराए जाने पर…देवी तुलसी गणेश जी से रुष्ट हो गई तथा तुलसी ने क्रोध में आकार गणेश जी को श्राप दे दिया…कि उनके दो विवाह होंगे। श्रापित गणेश जी भी तुलसी से कुपित हो उठे और उन्होंने भी देवी तुलसी को श्राप दे दिया। गणेश जी ने तुलसी को श्राप दिया कि तुलसी की संतान असुर होगी तथा असुरों द्वारा कुपित हो कर तुलसी वृक्ष बन जाएगी।

एक राक्षस की मां तथा वृक्ष बनने का श्राप सुनकर तुलसी व्यथित हो उठी तथा उन्होंने गणेश जी से क्षमा याचना करते हुए उनकी वंदना की।तुलसी की वंदना सुनकर गणेश जी का गुस्सा शांत हो गया तथा उन्होंने तुलसी से कहा – कि भगवान श्री कृष्ण तुम्हारा कल्याण करेंगे और तुम्हार यह दोष अमंगलकारी न हो…तुम्हारी संतान असुर शंखचूर्ण होगी….तुलसीके श्राप को पूरी तरह मुक्त ना करते हुए गणेश जी ने कहा –

तुलसी तुम वृक्ष के रूप में नारायण और श्री कृष्ण को प्रिय होगी तथा कलयुग में विश्वकल्याण हेतु मोक्षदायिनी देव वृक्ष के रूप में पूजी जाओगी…परंतु मेरे पूजन में तुम्हारा प्रयोग निषेध होगा।

तब से ही भगवान श्री गणेश जी की पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है।

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